इस विचार को पश्चिम में एक नाम है — LAT, "Living Apart Together"। हिंदी में कहिए तो "साथ मगर अलग घर में।" सुनने में विरोधाभासी लगता है। साठ के बाद कभी-कभी यही सबसे समझदार व्यवस्था होती है।
पहले एक सवाल। आप 62 साल के हैं। पहले विवाह में 35 साल बिताए। अब नया साथी मिला। क्या आप अपने घर को बेचकर, अपनी रसोई को उसकी रसोई में मिलाकर, अपनी दवाइयों का डिब्बा उसके डिब्बे के बग़ल में रखकर, एक साथ रहना चाहते हैं? या आप उसके साथ चाहते हैं, मगर अपना घर अपना रखना चाहते हैं?
जब "साथ" का मतलब "एक ही छत" नहीं
हमारी संस्कृति में "साथ रहना" और "एक घर में रहना" पर्यायवाची हैं। यह युवा जोड़ों के लिए सच है — उनके पास एक घर बनाना ही नई ज़िंदगी है। साठ के बाद कहानी बदलती है।
साठ के बाद आपके पास पहले से एक घर है। उस घर में स्मृतियाँ हैं। बाग़ है जिसे आपने तीस साल से पाला है। पड़ोसी हैं जो आपके नाम से पुकारते हैं। एक दिनचर्या है।
नया साथी भी यही ले आया है। अब अगर एक घर छोड़ना है, तो कौन छोड़े? दोनों में से जो भी छोड़े, एक छोटी मौत होगी।
LAT क्या देता है
LAT में आप दोनों अपने घर रखते हैं। सप्ताह के कुछ दिन साथ बिताते हैं — उसके घर या आपके घर। बाक़ी दिन अपने-अपने घर।
- अपनी दिनचर्या बची रहती है। आप सुबह पाँच बजे उठते हैं और प्राणायाम करते हैं। उन्हें नौ बजे उठना पसंद है। दोनों ठीक है, अलग घरों में।
- बच्चों के साथ संबंध आसान। बेटा आए तो आपके घर आए, उसके नए साथी के घर नहीं। कोई अजीब भावना नहीं।
- संपत्ति अलग। कोई "मेरा-तेरा" का झगड़ा नहीं। आपकी वसीयत अपने बच्चों के लिए साफ़ रहती है।
- एक-दूसरे को मिस करने का सुख। जब तीन दिन बाद मिलते हैं, तब बात सचमुच की होती है। रोज़ एक ही छत के नीचे रहने से कुछ "नियमित" हो जाता है।
LAT का कठिन पक्ष
यह रास्ता सबके लिए नहीं। कुछ लोगों को रोज़ का साथ चाहिए। उन्हें सोने-जागने, चाय-नाश्ता, रात के खाने में साथी की मौजूदगी चाहिए। उनके लिए LAT अधूरा लगेगा।
बीमारी के समय भी LAT मुश्किल है। अगर रात को अचानक कुछ हो जाए, कोई पास नहीं। इसलिए LAT चुनने वालों को कुछ तैयारी करनी पड़ती है — नज़दीक रहने वाले पड़ोसी, दोनों के फ़ोन पर एक-दूसरे के आपातकालीन संपर्क, किसी घरेलू सहायक की व्यवस्था।
भारतीय संदर्भ — समाज क्या कहेगा
अब सबसे बड़ा सवाल। भारत में रिश्तेदार, पड़ोसी, बच्चे — सब पूछेंगे। "आप दोनों साथ हैं तो शादी क्यों नहीं की?" "एक घर में क्यों नहीं रहते?"
इसका सीधा जवाब — क्योंकि हमारी उम्र और हमारे जीवन-चरण के लिए यही सबसे समझदार है। आप इसे समझाने में नहीं लगें, बस कह दीजिए: "हमारे लिए यही ठीक है।" अधिकतर लोग दूसरा सवाल नहीं पूछेंगे।
मुंबई बांद्रा की एक पाठिका, 64 साल, विधवा, ने मुझे बताया: "मेरे साथी पुणे में रहते हैं। हम दो हफ़्ते में एक बार एक-दूसरे के घर आते हैं, तीन-चार दिन रहते हैं। बच्चे पहले कहते थे 'अजीब है।' अब आदत हो गई। कहते हैं — 'माँ, आप ख़ुश हो, बस।'"
क़ानूनी और वित्तीय व्यवस्था
LAT में क़ानूनी चीज़ें महत्वपूर्ण हैं। आप शादीशुदा नहीं हैं, तो संपत्ति स्वतः नहीं जाती। मगर आप कुछ चीज़ें कर सकते हैं:
- वसीयत में एक-दूसरे का उल्लेख करें अगर चाहें।
- मेडिकल पॉवर ऑफ़ अटॉर्नी दें एक-दूसरे को — ताकि बीमारी में वे निर्णय ले सकें।
- आपातकालीन संपर्क में एक-दूसरे का नाम रखें।
- जो उपहार या साझा ख़र्च है — उसकी एक स्पष्ट समझ बनाएँ।
कब LAT से आगे बढ़ें
कभी-कभी LAT एक पड़ाव होता है। तीन-चार साल दोनों ख़ुश रहते हैं अलग घरों में, फिर एक को लगता है कि अब उम्र बढ़ी है, एक साथ रहना आसान होगा। तब आप इसे अगले क़दम की तरह चुनते हैं, न कि शुरू की मजबूरी की तरह।
लेकिन कई जोड़े दस साल LAT में रहते हैं और कभी साथ रहने नहीं आते। वह भी मान्य है। रिश्ते की सफलता का मापदंड एक घर में रहना नहीं है।
पहला क़दम
अगर आप साठ के बाद हैं और किसी से मिले हैं, और सोच रहे हैं कि आगे कैसे बढ़ें — तो पहली बातचीत में LAT का नाम न दीजिए। बस पूछिए: "आपको अपना घर कितना प्रिय है?" जवाब बहुत कुछ बताएगा।
फिर आप अपनी बात कहिए। यदि दोनों को अपने-अपने घर प्रिय हैं, तो LAT रास्ता है। अगर किसी एक को एक छत के नीचे रहना ज़रूरी है, तो वह बातचीत अलग होगी। दोनों मान्य हैं।
साठ के बाद रिश्ता सीखा-सिखाया होता है। जितना कम थोपेंगे, उतना ज़्यादा टिकेगा।