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वे जयपुर-मुंबई दुरंतो में मिले — तीन साल बाद

By admin Feb 04, 2026 1 min read
वे जयपुर-मुंबई दुरंतो में मिले — तीन साल बाद

जयपुर-मुंबई दुरंतो एक्सप्रेस एक चलती हुई राजस्थानी बैठक की तरह है। शिवांगी और करण वहाँ मिले। तीन साल बाद वो वैसे ही मिल रहे हैं।

जयपुर-मुंबई दुरंतो एक चलती हुई राजस्थानी बैठक की तरह है। चार दर्जे की चाय, बाहर थार का रेगिस्तानी किनारा, और कोच में पंद्रह घंटे साथ बैठे लोग जो एक-दूसरे के जीवन के छोटे टुकड़े देखते रहते हैं।

शिवांगी शर्मा, 29, मुंबई में एक आर्किटेक्चर फ़र्म में काम करती हैं। 2023 की फ़रवरी में वो जयपुर एक शादी के लिए गई थीं। वापस मुंबई आना था, फ़्लाइट कैंसिल हो गई (कोहरा, या कुछ और), और तत्काल विंडो में दुरंतो की एक 2AC टिकट मिली। करण मेहता, 31, बेंगलुरु बेस्ड, उसी ट्रेन में उसी कोच में — एक शादी से अपनी ओर लौट रहे थे।

पहला तीन घंटा

"हमारे सामने वाली बर्थ ख़ाली थी, पर दोनों ऊपरी बर्थ पर थे", शिवांगी बताती हैं। "करण ने सबसे पहले मुझे अपनी चार्जर केबल ऑफ़र की क्योंकि मेरा फ़ोन दस प्रतिशत पर था। यह कोई रोमांटिक बात नहीं थी — उन्होंने देखा कि मेरा फ़ोन लगभग डेड है। पर यही शुरुआत थी।"

फिर पानी, फिर अजमेर स्टेशन पर कोई मिठाई, फिर थाली का ऑर्डर साझा करना। ट्रेन इंडिया में एक अजीब जगह है — जहाँ अजनबियों के बीच दीवार पहले घंटे में ही गिर जाती है। अमूमन लोग इसका फ़ायदा नहीं उठाते। शिवांगी और करण ने उठाया।

जो बातचीत हुई

"हम नौकरी की बात से शुरू हुए, जो बोर होता है। फिर शादियों की बात पर गए — वो जयपुर की शादी कैसी थी, मेरा कज़िन क्यों बाहर शराब पी रहा था जब मेहंदी चल रही थी। ये छोटी कहानियाँ पूरी शाम चलीं।"

करण की कहानी अलग थी। "मैं उस वक़्त एक लंबे ब्रेकअप के तीन महीने बाद था। घर वाले शादी की बातें शुरू कर चुके थे। एक परिचित लड़की से मिलवा दिया था, वही जयपुर वाली शादी। मुझे उसमें कोई दिलचस्पी नहीं थी। ट्रेन में शिवांगी से मिलकर — ज़्यादा कुछ सोचा नहीं, बस अच्छा लगा बात करना।"

स्टेशन के बाद क्या हुआ

दुरंतो बांद्रा टर्मिनस पर सुबह छह बजे पहुँची। "इंस्टाग्राम पर एक-दूसरे को फ़ॉलो किया था, बस वो था", शिवांगी बताती हैं। "असली बातचीत शुरू नहीं हुई थी। वो बेंगलुरु चले गए, मैं मुंबई। दो हफ़्ते कुछ नहीं, फिर उन्होंने एक मीम भेजा, और बात फिर शुरू हो गई।"

लंबी-दूरी की शुरुआत कभी स्टेशन पर नहीं होती। ट्रेन से उतरने के दो हफ़्ते बाद होती है जब किसी एक को भेजने का मन होता है और वो भेजता है।

पहला वो वीकेंड

दो महीने बाद, शिवांगी बेंगलुरु गईं — अपने बड़े भाई के किसी फ़ंक्शन के बहाने, पर असल में करण से दोबारा मिलने के लिए।

"इंदिरानगर का एक छोटा कैफ़े था। दो घंटे बैठे, और मुझे पहली बार लगा कि यह कोई अजीब सपना नहीं था — वो इंसान सच में है। ट्रेन में मुलाक़ातें ख़्वाबों जैसी लगती हैं, क्योंकि पंद्रह घंटे बाद आप अपनी-अपनी दुनिया में लौट जाते हैं। लेकिन एक कैफ़े में, तीन महीने बाद, जब वो आप से पूछे 'चाय या कॉफ़ी?' — तब वो एक असली इंसान हो जाता है।"

लंबी दूरी के डेढ़ साल

मुंबई-बेंगलुरु का हवाई सफ़र एक तरफ़ ₹3500-6000 है। दोनों महीने में एक बार मिलते थे। "कभी मुंबई, कभी बेंगलुरु — पूरे हफ़्ते प्लानिंग करते थे, और तीन दिन में यह सब ख़त्म। फिर तीन हफ़्ते इंतज़ार।"

बीच में झगड़े हुए। एक बार तीन हफ़्ते बात बंद थी। "टेक्नोलॉजी डिस्टेंस रिलेशनशिप को आसान नहीं करती। वो आपको बेचैन करती है। एक कॉल कट जाए तो लगता है दुनिया ख़त्म।"

जो शहर बदला

2024 के आख़िर में करण ने मुंबई में नौकरी ली — अपनी कंपनी के मुंबई ऑफ़िस में ट्रांसफ़र। "यह मेरा फ़ैसला था, पर मैंने उन्हें कभी यह नहीं जताया कि 'मैं तुम्हारे लिए आया हूँ'। क्योंकि यह सच नहीं था पूरी तरह — मुंबई मेरा अगला क़दम था प्रोफ़ेशनली भी।"

पर असल में — "मैं शिवांगी के लिए भी आया था।"

तीन साल बाद आज

दोनों अंधेरी के एक फ़्लैट में रहते हैं। शादी? "परिवार की तरफ़ से प्रेशर है। पर हम दोनों को सही समय चाहिए। इंडिया में परिवार चाहता है कि एक लक्ष्मण रेखा हो — या तो पूरी तरह अलग रहो, या शादी करके साथ। हमने बीच का रास्ता चुना। यह आसान नहीं है।"

शिवांगी कहती हैं, "अगर हम उस दुरंतो में न मिले होते, हमारी कोई कहानी नहीं होती। कोई ऐप नहीं बताती कि जयपुर-मुंबई दुरंतो के 2AC कोच में कौन है। वो एक सुंदर अकस्मात था।"

करण मुस्कुराते हैं — "ट्रेन आज भी ऐसी ही चलती है। लोग चढ़ते हैं, उतरते हैं। हर 2AC में शायद कोई कहानी होती है। बस लोग चार्जर ऑफ़र नहीं करते एक-दूसरे को।"

छोटा सीख

यह कहानी रोमांटिक है, पर उसमें एक सीख है। ट्रैवल में लोगों से बात करना — ख़ासकर लंबी ट्रेन यात्राओं में — अभी भी एक कला है जो भारत में बची हुई है। अगला दुरंतो या राजधानी आप भी लेते हैं, तो फ़ोन बंद कीजिए पहले घंटे में। आपके सामने बैठा इंसान शायद एक कहानी का पहला पन्ना है।

या नहीं। ज़्यादातर वक़्त वो सिर्फ़ एक अजनबी है जो अपनी मंज़िल तक जा रहा है। पर कभी-कभार — कभी-कभार।

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